सुरो होटल के मालिक सुरेंद्र की सक्सेस स्टोरी
Motivational Story: बिहार के जमुई जिले के एक छोटे से गांव रामचन्द्रडीह में 1978 में जन्मे सुरेंद्र राय की जिंदगी की शुरुआत आसान नहीं था. उनका बचपन गरीबी और आर्थिक तंगी में बीता. परिवार की हालत ऐसे थे कि 12वीं पास करने के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़ना पड़ा.
घर की जिम्मेदारियों ने उन्हें मजबूर कर दिया कि वे आगे की पढ़ाई के बजाय कमाई के रास्ते पर चल पड़ें. इसके लिए वे दिल्ली गए और वहां मजदूरी करने लगे. लेकिन सुरेंद्र को किसी के नीचे काम करना पसंद नहीं आया. वे अपने तरीके से कुछ करना चाहते थे. इसलिए दिल्ली छोड़कर वे अपने गांव लौट आए.
उनके पिता भीम राय एक किसान थे और ज्यादा मदद नहीं कर सकते थे. लेकिन उन्होंने अपने बेटे का हौसला हमेशा बढ़ाया. पिता ने कभी सुरेंद्र की पसंद-नापसंद में दखल नहीं दिया. इसी हौसले ने सुरेंद्र को आगे बढ़ने की ताकत दी.
गांव लौटने के बाद शुरू की चाय की दुकान
गांव लौटने के बाद उन्होंने चकाई बाजार में एक छोटी सी चाय की दुकान शुरू की. लोग उन्हें प्यार से “सुरो” कहकर बुलाते थे. यह दुकान उनकी मेहनत और लगन का पहला कदम था. करीब 24 साल पहले शुरू हुई इस चाय की दुकान ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी.
सुरेंद्र ने दिन-रात मेहनत की और कभी हार नहीं मानी. साल 2010 में उन्होंने अपनी चाय की दुकान के पास ही “सुरो भोजनालय” नाम से पहला होटल खोला. इस होटल में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह का खाना मिलता था. लोगों को उनका खाना इतना पसंद आया कि धीरे-धीरे उनकी पहचान बनने लगी.
आत्मविश्वास और मेहनत लाई रंग
सुरेंद्र का आत्मविश्वास और मेहनत रंग लाई. साल 2016 में उन्होंने गोपीडीह में दूसरी शाखा खोली. फिर 2021 में चकाई ब्लॉक के सामने तीसरी शाखा और 2022 में देवघर में चौथी शाखा शुरू की. उनकी मेहनत का सिलसिला यहीं नहीं रुका. अब साल 2025 में उन्होंने देवघर में एलआईसी ऑफिस के सामने अपनी पांचवीं शाखा खोलकर एक नया कीर्तिमान बनाया है.
सुरो भोजनालय आज इलाके में मटन के लिए मशहूर है. लोग दूर-दूर से यहां खाने आते हैं. सुरेंद्र ने कम कीमत में स्वच्छ और स्वादिष्ट खाना देने का लक्ष्य रखा, जो लोगों को बहुत पसंद आया. उनके होटल में नौकरीपेशा लोग, आम आदमी, और खाने के शौकीन सभी आते हैं.
सुरेंद्र ने अब 45 से ज्यादा लोगों को दिया रोजगार
उनकी मेहनत ने न सिर्फ उन्हें सफल बनाया, बल्कि 45 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी दिया. आज उनके बेटे सचिन भी इस काम में उनका साथ दे रहे हैं। महीने का टर्नओवर करीब 10 लाख रुपये तक पहुंच गया है.
सुरेंद्र राय की कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत और आत्मविश्वास से कोई भी मुश्किल राह आसान हो सकती है. एक छोटी सी चाय की दुकान से शुरू हुआ उनका सफर आज पांच होटलों तक पहुंच गया.
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उनकी सफलता इस बात का सबूत है कि नौकरी ही इंसान को ऊंचाइयों तक नहीं पहुंचाती, बल्कि अपनी मेहनत और लगन से भी जिंदगी में सम्मान और कामयाबी हासिल की जा सकती है. सुरेंद्र आज अपने जिले और राज्य के लिए एक मिसाल हैं। उनकी कहानी हर उस इंसान को प्रेरणा देती है जो मुश्किलों के बीच अपने सपनों को पूरा करना चाहता है।