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कहीं यह अराजकता भारी न पड़ जाएं

Bangladesh: बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों की चुप्पी एक अराजक समाज की सृष्टि में मौन सहभागिता के रूप में देखी जा सकती है. यदि यह उपद्रव मात्र 8% हिंदू आबादी को केन्द्रित कर रची गई है, तो मानवता के लिए एक ऐतिहासिक कलंककारी घटना सिद्ध होगी.
Newsmorrow Digital Desk August 12, 2024 1 minute read
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डॉ श्याम कुमार झा, संस्कृत विभागाध्यक्ष, महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहिरी | बांग्लादेश में जिस प्रकार से सुप्रीम कोर्ट में उपद्रवियों ने प्रवेश कर हंगामा करते हुए मुख्य न्यायाधीश को अल्टीमेटम देकर त्यागपत्र देने के लिए मजबूर किया, वह गंभीर चिंता का विषय है. इस घटना पर बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों की चुप्पी एक अराजक समाज की सृष्टि में मौन सहभागिता के रूप में देखी जा सकती है. यदि यह उपद्रव मात्र 8% हिंदू आबादी को केन्द्रित कर रची गई है, तो मानवता के लिए एक ऐतिहासिक कलंककारी घटना सिद्ध होगी. इस प्रकार की गतिविधियों में शामिल सभी लोगों को भविष्य में इसके लिए जबाब देना होगा.

अगर यह राजनीतिक साजिश थी, तो प्रधानमंत्री के देश छोड़कर चले जाने के बाद, नोबेल पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने के साथ ही यह आंदोलन स्वतः समाप्त हो जाना चाहिए था. अब तो यह स्पष्ट होता दिख रहा है कि छात्रों का यह आन्दोलन आरक्षण के खिलाफ एक आंदोलन भर नहीं था. सरकार के आरक्षण विषयक निर्णय को वापस लेने के बाद जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट और रिजर्व बैंक पर दबाव बनाया गया, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह आंदोलन अब छात्रों के हाथ से निकलकर उपद्रवी तत्वों के हाथों चला गया है और वहाँ की सेना कठपुतली बनी तमाशा देख रही है. किसी भी देश की न्याय व्यवस्था निरपेक्ष होती है, और बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह से उपद्रवियों ने हमला कर मुख्य न्यायाधीश से त्यागपत्र दिलवाया है, यह एक गहरी साजिश का परिणाम है. इस मामले में पुलिस और सेना की निष्क्रियता भी गंभीर चिंता का विषय है.

पूरी विश्व बिरादरी को बांग्लादेश में हो रही असंवैधानिक गतिविधियों और लोकतंत्र के नाम पर संवैधानिक संस्थाओं पर हो रहे हमलों की निंदा करनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को बांग्लादेश पर दबाव बनाने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में होने वाले गंभीर परिणामों से बचा जा सके. वहाँ की हिंदू आबादी के खिलाफ हो रहे हमले अमानवीय और निन्दनीय है.

भारत सरकार को इस मामले में बांग्लादेश पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव बनाने की जरूरत है. यदि बांग्लादेश की सरकार वहाँ के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करती है, तो भारत विश्व मंच पर इस मामले को गम्भीरतापूर्वक रखे. बांग्लादेश के नागरिकों को भी इन जिहादी और उपद्रवी तत्वों का समर्थन बंद करना चाहिए, क्योंकि यदि इस प्रकार की गतिविधियां जारी रहती हैं, तो उसकी स्थिति पाकिस्तान से भी बदतर हो जाएगी.अमेरिका और पश्चिमी देश भी समय-समय पर बांग्लादेश की मदद करते आए हैं. पिछले 25-30 वर्षों में अफगानिस्तान के हालात को विश्व विरादरी ने देखा है. उस अनुभव से सीख लेते हुए, बांग्लादेश में अंकुरित हो रहे अराजक और जेहादी तत्वों की विस्फोटक प्रवृत्तियों पर अगर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो इससे न केवल बांग्लादेश को नुकसान होगा, बल्कि आतंकवाद और उग्रवाद की छाया पश्चिम के साथ पूरी दुनिया में पहुंचने में देर नहीं लगेगी. फ्रांस में अस्थिरता फैलाने में पिछले वर्षों जिहादी मानसिकता वाले तत्वों की भूमिका को हम सबों ने देखा है. कहीं न कहीं धर्मांधता के रंग में डूबे हुए इन तत्वों की यह साजिश है कि पूरे विश्व को धार्मिक रूप से अस्थिर किया जाए. लोकतंत्र के हिमायती विश्व के समस्त नागरिकों को आज बांग्लादेश के मुद्दे पर एकजुट होकर सोचने की आवश्यकता है. संयुक्त राष्ट्र संघ में बांग्लादेश में हो रहे लोकतंत्र पर हमले और वहां की अल्पसंख्यक आबादी पर निरंतर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ एक निंदा प्रस्ताव पास कर बांग्लादेश को संपूर्ण विश्व जनमानस के समक्ष अलग-थलग करने की आवश्यकता है.आशा करते हैं कि बांग्लादेश में फिर से अमन-चैन का वातावरण कायम होगा और वहाँ एक बार फिर वास्तविक शासन तंत्र की पुनः स्थापना होगी, जिसमें सभी नागरिक खुलकर साँस ले सकेंगे.

बांग्लादेशी प्रधानमंत्री कार्यालय में लूट

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