आरबीआई, फोटो - सोशल मीडिया
भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI ने 18 जून को प्रोजेक्ट फाइनेंस को लेकर बहुप्रतीक्षित ‘RBI (Project Finance) Directions, 2025’ जारी कर दी है. ये दिशा-निर्देश अब 1 अक्टूबर 2025 से लागू होने वाले हैं और इसमें प्रोजेक्ट लोन के इनकम रिकग्निशन, एसेट क्लासिफिकेशन और प्रोविजनिंग के नियमों को नए सिरे से तय किया गया है.
आरबीआई ने इस दिशा में पहली बार 3 मई 2024 को ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी की थीं और सभी हितधारकों से सुझाव मांगे थे. इसके बाद लगभग 70 से अधिक संस्थानों ने अपने विचार साझा किए। जिनमें बैंक, एनबीएफसी, इंडस्ट्री बॉडीज, शिक्षाविद, लॉ फर्म्स, आम नागरिक और केंद्र सरकार भी शामिल थीं.
क्या है नए नियमों की खास बातें?
- स्ट्रेस्ड प्रोजेक्ट्स के लिए अब एक प्रिंसिपल-बेस्ड रिजोल्यूशन फ्रेमवर्क लागू किया गया है, जो सभी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं पर समान रूप से लागू होगा.
- इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए DCCO (Date of Commencement of Commercial Operations) को अधिकतम 3 साल तक टाला जा सकता है, जबकि नॉन-इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए यह सीमा 2 साल होगी.
प्रोविजनिंग को लेकर क्या हैं नए बदलाव?
निर्माणाधीन प्रोजेक्ट्स पर अब
- सामान्य एसेट प्रोविजनिंग 1% रखी गई है, जो कि हर तिमाही DCCO के डिफरमेंट के साथ धीरे-धीरे बढ़ेगी.
- अंडर-कंस्ट्रक्शन कमर्शियल रियल एस्टेट (CRE) के लिए यह दर 1.25% होगी.
ऑपरेशनल फेज में,
- CRE प्रोजेक्ट्स के लिए प्रोविजनिंग 1%,
- CRE-RH (Residential Housing) के लिए 0.75%,
- और अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए 0.40% तय की गई है.
क्यों अहम हैं ये नई गाइडलाइंस?
इन नए नियमों का उद्देश्य प्रोजेक्ट लेंडिंग में लचीलापन बनाए रखना है, साथ ही जोखिम प्रबंधन के लिए मजबूत सुरक्षा कवच भी तैयार करना है. यह लंबे समय से बैंकों और डेवलपर्स की मांग रही थी कि उन्हें ऐसे नियम मिलें जो विकासशील प्रोजेक्ट्स की अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए लोन के स्ट्रक्चर को संतुलित करें.
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अब देखना दिलचस्प होगा कि 1 अक्टूबर से लागू ये दिशानिर्देश किस तरह भारत के प्रोजेक्ट फाइनेंस परिदृश्य को नया आकार देते हैं।