MGCU Events: महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन विभाग में ‘प्राचीन संचार एवं परंपरा’ विषयक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया.
कार्यक्रम के मुख्य संरक्षक माननीय कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव थे. व्याख्यान का उद्देश्य विद्यार्थियों को प्राचीन भारतीय संचार प्रणाली के महत्व और उसकी विकास यात्रा से परिचित कराना था.
विभागाध्यक्ष ने किया कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम का शुभारंभ विभागाध्यक्ष डॉ अंजनी कुमार झा के स्वागत भाषण से हुआ. उन्होंने ‘जैक ऑफ ऑल’ की अवधारणा के माध्यम से प्राचीन भारत में संचार के विविध साधनों पर प्रकाश डाला.
समाज की प्रगति संचार प्रणाली की प्रभावशीलता पर निर्भर
उन्होंने बताया कि कैसे प्राचीन काल में मौखिक परंपरा, संकेत भाषा, चित्रलिपि, पत्र, दूत व्यवस्था और ताम्रपत्र जैसे माध्यमों का उपयोग किया जाता था.
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी समाज की प्रगति उसके संचार प्रणाली की प्रभावशीलता पर निर्भर करती है. सूचना और ज्ञान का प्रसार जितना प्रभावी होगा, समाज उतनी ही तेजी से आगे बढ़ेगा.
मुख्य वक्ता ने क्या कहा?
मुख्य वक्ता प्रो सीपी सिंह ने कहा कि 18वीं सदी तक भारत दुनिया में सबसे आगे था, और दुनिया के कई हिस्सों से लोग भारत आना चाहते थे क्योंकि भारत ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में बहुत विकसित था.
उनका कहना था कि यह इतिहास भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और संचार के प्रभावशाली साधनों का गवाह है. इसके अलावा संचार की अवधारणा को विस्तार से समझाया.
प्रोफेसर सीपी सिंह कहा कि संचार केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा सेतु है, जो समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ता है.
उन्होंने “सहृदयता और साधारणीकरण” की महत्ता पर बल दिया और कहा कि जब हम संवाद में सहृदयता का समावेश करते हैं, तो हम सामने वाले की भावनाओं को समझते हैं और उनसे गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं.
उन्होंने सरल भाषा में समझाते हुए कहा कि साधारणीकरण का अर्थ यह है कि किसी भी संदेश को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए कि वह अधिक से अधिक लोगों के लिए स्पष्ट और सुगम हो.
कुशल संचारक के होते हैं ये गुण
सीपी सिंह ने कहा कि एक कुशल संचारक वह होता है, जो जटिल विषयों को भी सहज और बोधगम्य तरीके से प्रस्तुत कर सके. प्रो सिंह ने संचार के ऐतिहासिक विकास पर चर्चा करते हुए कहा कि भारत में संचार की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है.
वेदों और पुराणों की मौखिक परंपरा से लेकर ताम्रपत्र, शिलालेख, हस्तलिखित ग्रंथों और पत्राचार प्रणाली तक, भारत ने विभिन्न संचार माध्यमों को अपनाया है.
पूराने समय में गुरुकुल और मौखिक शिक्षा का था महत्व
उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं के दूत महत्वपूर्ण संदेशों का आदान-प्रदान किया करते थे. ताम्रपत्रों और शिलालेखों के माध्यम से नीतियों और घोषणाओं का संचार किया जाता था.
गुरुकुल प्रणाली में मौखिक शिक्षा का विशेष महत्व था, जिसमें शिक्षक अपने शिष्यों को कंठस्थ कराकर ज्ञान का प्रसार करते थे.
उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक डिजिटल क्रांति ने संचार की प्रक्रिया को और अधिक तेज, प्रभावी और व्यापक बना दिया है, लेकिन इसकी जड़ें हमारी प्राचीन परंपराओं में ही निहित हैं.
डॉ पीके मिश्र ने कही ये बात
व्याख्यान के संयोजक डॉ परमात्मा कुमार मिश्र ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि किसी भी विषय को गहराई से समझने के लिए सुनने की कला आवश्यक है.
पीके मिश्र ने कहा, ज्ञान अर्जन के लिए हमें मुख्य वक्ता के अनुभवों और अध्ययन को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए, क्योंकि वे अपने शोध और अनुभवों के माध्यम से हमें नई सोच प्रदान करते हैं.
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डॉ मिश्र ने आगे विद्यार्थियों को सीखने और जिज्ञासु बने रहने की सलाह दी. उनका कहना था कि केवल पढ़ाई तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझना भी जरूरी है.
डॉ घोड़के ने क्या कहा?
कार्यक्रम के अंत में डॉ सुनील दीपक घोड़के ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। उन्होंने शब्दों की गरिमा और प्रभावशीलता पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि शब्द केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं, बल्कि समाज में सद्भाव, प्रेरणा और सकारात्मकता लाने का सशक्त साधन भी हैं.
शब्दों का प्रभाव स्थाई होता है
डॉ घोड़के ने आगे कहा कि किसी भी संवाद में भाषा की शुद्धता, सम्मान और मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है, क्योंकि शब्दों का प्रभाव स्थायी होता है.
उन्होंने विद्यार्थियों को सुझाव दिया कि वे अपने शब्दों के चयन में सावधानी बरतें और प्रभावी संचार के महत्व को समझें. विशेष व्याख्यान में मीडिया अध्ययन विभाग के शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की उपस्थिति थी.